इतिहास

about dagdusheth ganapati

कई सालों पहले प्लेगके दौरेमें अपना इकलौता बेटा खोनेके बाद श्रीमंत दगडुशेठ हलवाई और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाईने इस गणेश-मूर्तीकी प्रतिष्ठापना की. हर साल न केवल दगडुशेठका परिवार, बल्कि आसपासके सभी लोग गहरे भक्तिभावसे और जोशके साथ गणेशोत्सव मनाते रहे. तब अपनी जवान उम्रमें तात्यासाहेब गोडसे इस गणेश-उत्सवके एक उत्साही कार्यकर्ता थे. बादमें जब लोकमान्य तिलकजीने आजादीके संघर्षमें लोगोंको इकट्ठा करनेके लिये गणेशोत्सवको सार्वजनिक उत्सवका रूप दिया तब दगडुशेठ गणपतीको सर्वाधिक लोकप्रियताका सम्मान प्राप्त हुआ.

१९५२ में दगडुशेठ हलवाई गणपती मंदिर उत्सवके अनुशासनकी जिम्मेदारी तात्यासाहेब और उनके मित्र-परिवारपर आ पडी. तात्यासाहेबके मार्गदर्शनमें उसके सहयोगी मामासाहेब रासणे, अॅड. श्री. शंकरराव सूर्यवंशी और श्री. के. डी. रासणे इन मंडलीने यह जिम्मा खूब अच्छीतरह निभाया और उसके बाद यह सिलसिला कभी रुका ही नहीं. उदार दानी व्यक्ती और भक्त मंदिरके दान-पात्रमें बहोत उदारताके साथ अपनी देनें देते रहे. तब तात्यासाहेब और उनके मित्र-परिवारने सोचा, कि इस निधीसे अपनेही बांधवोंकी सेवा करनेसे बढकर ईश्वरसेवा और क्या हो सकती है? इस ध्येयसे प्रेरित इन युवकोंने उत्सवके कार्यकी व्याप्ती परंपराप्राप्त पूजाविधीके आगे ले जाकर सामाजिक और सांस्कृतिक विकासके क्षेत्रमें कदम रखा. मंदिरमें किये जानेवाले धर्मकार्य तो पूरे तामझामसे होतेही रहे, पर इन्होंने अपने राज्यके सामाजिक और राजनैतिक प्रश्नोंकी ओर भी अपना ध्यान मोडा.

’श्रीमंत दगडुशेठ हलवाई गणपती ट्रस्ट’ के माध्यमसे उन्होंने कई समाजसेवी कार्योंका आरंभ किया. वंचित बच्चोंकी शिक्षा, और उन्हें पैसोंकी मदद, छोटे कारोबार खडे करनेवालोंको या फिर छोटे विक्रेताओंको ’सुवर्णयोग सहकारी बँक’की तरफसे आर्थिक सहाय्यता; वृद्धाश्रम, ईेंट-भट्टीके मजदूरोंका पुनर्वसन यह कुछ उदाहरण इसमें शामिल हैं.

आज श्रीगणेशजीके आशीर्वादसे ’श्रीमंत दगडुशेठ हलवाई सार्वजनिक गणपती ट्रस्ट’ ये एक समाजकी अगवानी करनेवाली समृद्ध संस्था बन चुकी है. मानवसेवा ही ईश्वरसेवा है इस भावसे काम करनेमें एक बडा आनंद ले रही है.